Wednesday, 31 August 2016

Saturday, August 12, 2017

Funny Story In Hindi With Moral - अंधविश्वास पर प्रहार। मजाकिया कहानी

नादिरशाह के हमले के बाद मुग़ल साम्राज्य छिन्न - भिन्न हो गया था। मुग़ल शासन की कमजोरियों का फायदा उठाकर उस समय कई सूबेदारों ने अपने स्वतंत्र राज्य कायम कर लिए थे। ऐसे ही राज्यों में से एक राज्य था - अवध,जिसकी नींव रखी थी - नवाब सआदत अल खां ने। अवध राज्य की राजधानी लखनऊ थी। 

Funny story in hindi

लखनऊ के नवाबों के तहजीब और शान - शौकत के किस्से आज भी सारे भारत में प्रसिद्ध है। यहाँ की बेगमे और सहजादियाँ भी कम नाज़ नखरों वाली नहीं थी। उनके भी अनेक किस्से लोगों की जुबान पर है। 

अवध राज्य के शहजादे और सहजादियाँ जितने नाजुक मिजाज और नाज़ -नखरे  वाले थे, उतने ही अधिक वो अंधविश्वासी भी थे। 

नवाबी शासन के पांचवे नवाब अमजद अली शाह की मृत्यु जवानी में ही हो गयी थी। नवाब का अंतिम संस्कार करने के बाद उनकी बेगम मलिका किश्वर बहादुर ने रियासत के प्रसिद्ध ज्योतिषियों और मौलवियों को बुलाकर नवाब साहब की मौत का कारण जानना चाहा। ज्योतिषियों और मौलवियों ने बताया की बेगम साहिबा, उनकी उम्र बस इतनी ही थी। 

लेकिन बेगम को उनकी बात पर ऐतबार नहीं आया। वह कहने लगी - तुम लोग मुर्ख हो। तुम लोगो को कुछ भी  ज्ञान नहीं है, नवाब साहब का इंतकाल किसी अपशकुन के कारण हुआ है। 

मौलवियों और ज्योतिषियों ने अपने पोथी पन्ने पुनः देखे और बेगम साहिबा की इच्छानुकूल नवाब साहब की मृत्यु का कारण ढूंढ लिया। वो सब एक स्वर में बोले - "हाँ बेगम साहिबा, आप सही फरमा रही है, नवाब साहब की मौत होने का दूसरा ही कारण है। 

"क्या कारण है, बताओ जल्दी ? " बेगम किश्वर बहादुर की उत्सुकता बढ़ गयी थी। 

बड़े मौलवी ने अपनी सफ़ेद दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए अदा से कहा - बेगम साहिबा , इस राज सिंहासन के नीचे एक विषैला सांप है, जो सांस के साथ जहर छोड़ता है। उसी सांप के कारण नवाब साहब का इंतकाल हुआ है। "

बेगम अन्धविश्वास और शकुन-अपशकुन में विश्वास करती थी, इसलिए मौलवी की बात पर पूरा यकींन आ गया। वह बोली - हाँ अबकी बार सही कारण मालुम कर लिया है। अवश्य ही नवाब साहब की मृत्यु इसी कारण से हुई है। "

बेगम ने ज्योतिषियों और मौलवियों को पुरस्कार दिए। वो सब खुश होकर अपने-अपने घरों को लौट गए। 

नवाब अमजदअली शाह के चालीसा के बाद वह घड़ी भी आई, जा उनके पुत्र वाजिद अली शाह को गद्दी पर बैठना था। उस दिन रियासत के सब मौलवियों और ज्योतिषियों को बुलाया गया। मलिका किश्वर बहादुर ने शुभ लगन और मुहूर्त में अपने बैटे को गद्दी पर बिठाना चाहा। ज्योतिषियों ने एक-एक पल का हिसाब लगाकर उन्हें शुभ घड़ी की जानकारी दी। 

लेकिन बेगम ने इस बात पर पहले ही एलान का दिया की वाजिदअली शाह अपने पुरखो की उस राजगद्दी पर नहीं, बैठेगा, जिसके नीचे विषैला सांप बैठा है। 

बेगम की बात को कौन टाल सकता था। वाजिदअली शाह नवाब होकर भी सिंहासन पर नहीं बैठ पाया। उसे अपनी माँ की यह जिद्द अंधविश्वासपूर्ण लगी ,  पर उस समय कुछ बोल नहीं पाया। 

लगभग तीन माह बाद एक दिन वाजिद अली घोड़े पर बैठ का बाहर घूमने को निकला। रास्ते में उसे के स्री और के पुरुष मिले। नवाब को आते देख कर पुरुष ने स्री से कहा "रास्ते से हैट जा, नवाब शाहब तशरीफ़ ला रहे है। 

स्री रास्ते से नहीं हटी और नवाब साहब को सुनाते हुए बोली - नवाब तो वह होता है, जो सिंहासन पर बैठता है। बिना सिंहासन के नवाब कैसा ?

अब क्या था ? स्त्री की व्यंग्य भरी बोली नवाब को तीर की तरह चुभ गयी। वह तुरंत लखनऊ लौटा और अपनी माँ की परवाह किये बगैर उसने सिंहासन को खुदवा डाला। मजे की बात यह रही की सिहासन के नीचे सांप के मिलने की बात तो दूर रही, एक मामूली कीड़ी भी नहीं मिली। 

कहते है इस घटना के बाद बेगम किशवर बहादुर की आँखे खुल गयी और वह जब तक जीवित रही, उन्होंने कभी अंधविश्वासों पर ऐतबार नहीं किया। अवध की जनता ने वाजिद अली शाह के इस साहस की सराहना की।  

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